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title: "सामान ख़त्म होने से पहले कैसे पता चले"
source: https://www.lskhata.com/blog/saman-khatam-hone-se-pehle
category: "Stock & money"
language: hi
published: 2026-08-16
reading_time: 7 min
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# सामान ख़त्म होने से पहले कैसे पता चले

_"ख़त्म हो गया" पता चलने का सबसे महँगा तरीक़ा ग्राहक का पूछना है। सही वक़्त वह है जब बचा हुआ माल सप्लायर के आने तक ही चले।_

## In short
- हर चलने वाले सामान के लिए एक बिंदु तय कीजिए — वह मात्रा जिस पर पहुँचते ही ऑर्डर जाना है, शून्य पर नहीं।
- यह बिंदु दो चीज़ों से बनता है: रोज़ कितना बिकता है, और सप्लायर को आने में कितने दिन लगते हैं।
- सप्लायर की देरी को हिसाब में जोड़िए। जो सप्लायर तीन दिन कहता है और छह दिन लेता है, उसके लिए छह ही मानिए।
- पूरे स्टॉक पर यह मत लगाइए। जो बीस-तीस चीज़ें आधी बिक्री बनाती हैं, बस उन्हीं पर।

दुकान में सामान ख़त्म होने का पता आम तौर पर तीन में से किसी एक तरीक़े से चलता है: ग्राहक माँगे और न मिले, कोई डिब्बा उठाते वक़्त हल्का लगे, या महीने की गिनती में सामने आए। तीनों का एक ही मतलब है — पता तब चला जब बिक्री जा चुकी थी।

इसका हल पूरा स्टॉक रोज़ गिनना नहीं है। हल यह है कि कुछ चुनी हुई चीज़ों के लिए पहले से एक मात्रा तय कर दी जाए, जिस पर पहुँचते ही ऑर्डर जाएगा। शून्य पर नहीं — उससे बहुत पहले।

_[Figure: बिंदु वहाँ है जहाँ बचा हुआ माल सप्लायर के आने तक चल जाए।]_

### बिंदु कैसे तय होता है

इसमें सिर्फ़ दो चीज़ें लगती हैं, और दोनों आपको पहले से पता हैं — भले लिखी न हों।

1. **रोज़ की औसत बिक्री निकालिए** — पिछले तीस दिन में जितना बिका, उसे तीस से भाग दीजिए। बहुत सटीक होने की ज़रूरत नहीं; "रोज़ लगभग चार" काफ़ी है।
2. **सप्लायर के असली दिन गिनिए** — वह नहीं जो वह कहता है — वह जो पिछली तीन बार सचमुच लगा। यही वह जगह है जहाँ ज़्यादातर हिसाब ग़लत बैठता है।
3. **दोनों को गुणा कीजिए** — रोज़ चार और छह दिन का मतलब चौबीस। यानी जब चौबीस बचे हों, तब तक ऑर्डर जा चुका होना चाहिए।
4. **दो-तीन दिन का बचाव जोड़िए** — गाड़ी लेट होती है, माल कम आता है, त्योहार पड़ जाता है। यह जोड़ा हुआ हिस्सा उन दिनों के लिए है — इसे बहुत बड़ा भी मत रखिए, वरना पैसा माल में फँसा रहेगा।
5. **बिंदु लिख लीजिए और उसे मानिए** — बिंदु पर पहुँचने का मतलब है ऑर्डर, चाहे उस दिन गोदाम भरा लगे। जिस दिन आपने "अभी तो है" कहकर टाला, उसी दिन से यह तरीक़ा काम करना बंद कर देता है।

| रोज़ बिकता है | सप्लायर के दिन | बचाव | बिंदु |
| --- | --- | --- | --- |
| २ | ४ दिन | २ दिन | १२ |
| ४ | ६ दिन | २ दिन | ३२ |
| १० | ३ दिन | २ दिन | ५० |
| १ | १० दिन | ३ दिन | १३ |

इस तालिका में ध्यान देने लायक़ बात यह है कि सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ का बिंदु सबसे ऊँचा है, पर सबसे दूर के सप्लायर वाली चीज़ का बिंदु भी उसकी बिक्री के मुक़ाबले ऊँचा है। दोनों वजहें अलग हैं और दोनों असली हैं।

**सप्लायर के कहे दिन मत मानिए.** हर सप्लायर अपना समय कम बताता है, और यह झूठ नहीं होता — वह सबसे अच्छे दिन की बात कर रहा होता है। आपके लिए वही दिन मायने रखते हैं जो पिछली तीन बार सचमुच लगे। एक बार यह लिख लीजिए, फिर पूरे साल काम आएगा।

### किन चीज़ों पर लगाना है

यह तरीक़ा पूरे स्टॉक पर लगाने की चीज़ नहीं है। पाँच सौ चीज़ों के लिए बिंदु तय करना दो दिन का काम है और तीसरे दिन छोड़ दिया जाता है।

- जो रोज़ बिकती है और ख़त्म होने पर ग्राहक लौट जाता है — यही सबसे ऊपर।
- जो सप्लायर बहुत दूर का है या महीने में एक बार ही आता है।
- जो त्योहार या मौसम में अचानक तेज़ चलती है।
- जिसका दाम ज़्यादा है और जिसे "फिर मँगा लेंगे" कहकर टालना महँगा पड़ता है।

इनके अलावा बाक़ी सारा सामान महीने में एक बार की नज़र से चल जाता है। बीस चीज़ों का बिंदु सचमुच काम करता है; पाँच सौ चीज़ों का बिंदु सिर्फ़ काग़ज़ पर रहता है।

### जो सामान बहुत ज़्यादा पड़ा है

यही तरीक़ा उलटी तरफ़ से भी काम आता है। अगर किसी चीज़ का स्टॉक बिंदु से कई गुना ऊपर पड़ा है और वह हिल नहीं रही, तो वहाँ आपका पैसा फँसा हुआ है — और वही पैसा उस सामान में लग सकता था जो रोज़ बिकता है।

> ख़ाली शेल्फ़ बिक्री ले जाती है। भरी हुई शेल्फ़ पैसा रोक लेती है। बिंदु दोनों के बीच की लकीर है।

### इस हफ़्ते क्या कीजिए

अपनी दस सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ें लीजिए। हर एक के लिए रोज़ की बिक्री और सप्लायर के असली दिन लिखिए, और बिंदु निकाल लीजिए। यह आधे घंटे का काम है।

अगले महीने आप देखेंगे कि इन दस में से कोई भी ख़त्म नहीं हुई। बाक़ी सामान पर यही तरीक़ा तब बढ़ाइए जब यह दस पर टिक चुका हो।

## Common questions

**री-ऑर्डर का बिंदु कैसे निकालूँ?**

दो नंबर चाहिए — रोज़ की औसत बिक्री, और सप्लायर को माल पहुँचाने में लगने वाले दिन। इन्हें गुणा कीजिए और उसमें कुछ दिन का बचाव जोड़ दीजिए। मान लीजिए एक चीज़ रोज़ चार पैकेट बिकती है और सप्लायर पाँच दिन लेता है — बीस पैकेट लगेंगे, और दो दिन का बचाव जोड़कर बिंदु अट्ठाईस के आसपास बैठेगा। यह हिसाब सटीक नहीं है, पर शून्य पर जागने से बहुत बेहतर है।

**हर सामान के लिए यह तय करना पड़ेगा?**

नहीं, और नहीं करना चाहिए। हर दुकान में बीस से तीस चीज़ें ऐसी होती हैं जो आधे से ज़्यादा बिल में आती हैं — यही वे चीज़ें हैं जिनके ख़त्म होने पर ग्राहक लौटता है। बाक़ी सामान के लिए महीने में एक बार नज़र डाल लेना काफ़ी है। सब पर एक साथ लागू करने की कोशिश ही वह वजह है जिससे लोग यह तरीक़ा छोड़ देते हैं।

**त्योहार के दिनों में यह बिंदु वही रहेगा?**

नहीं। त्योहार के हफ़्तों में रोज़ की बिक्री कई गुना हो जाती है, इसलिए वही पुराना बिंदु बहुत देर से बजेगा। सीज़न शुरू होने से पहले उन दस-पंद्रह चीज़ों का बिंदु बढ़ा दीजिए जिनकी माँग बढ़ने वाली है, और सीज़न ख़त्म होने पर वापस घटा दीजिए — वरना बाद में वही माल पड़ा रह जाता है।

**क्या ऐप ख़ुद बता देगा कि सामान कम है?**

खाता ऐप में स्टॉक कम होने पर वह अलग से गिना और दिखाया जाता है, इसलिए सूची में उसे ढूँढ़ना नहीं पड़ता। पर बिंदु आपको ही तय करना है — कोई ऐप यह नहीं जान सकता कि आपका सप्लायर सचमुच कितने दिन लेता है, या कौन सी चीज़ ख़त्म होने पर आपका ग्राहक बग़ल की दुकान चला जाता है।
