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title: "उधार वसूली का सही तरीका: रिश्ता भी बचे, पैसा भी आए"
source: https://www.lskhata.com/blog/udhaar-vasooli-ka-sahi-tarika
category: "Running a shop"
language: hi
published: 2026-08-11
reading_time: 7 min
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# उधार वसूली का सही तरीका: रिश्ता भी बचे, पैसा भी आए

_उधार माँगना झगड़ा बन जाता है क्योंकि उसका कोई तय क्रम नहीं होता। यह वही क्रम है — दिन सात, दिन पंद्रह, दिन तीस।_

## In short
- वसूली मूड पर नहीं, तय क्रम पर चलती है। दिन सात पर याद, दिन पंद्रह पर तारीख़, दिन तीस पर आमने-सामने।
- पहला संदेश माँग नहीं होता — सिर्फ़ हिसाब की जानकारी होती है। इसी वजह से वह काम करता है।
- हर ग्राहक का फ़ोन नंबर खाते में होना चाहिए। नंबर न हो तो याद दिलाना अपने आप टकराव बन जाता है।
- सबसे पुराना बकाया पहले उठाइए, सबसे बड़ा नहीं। पुराना पैसा हर बीतते हफ़्ते के साथ और मुश्किल होता जाता है।

उधार देना दुकान का हिस्सा है। जो दुकानदार बिलकुल उधार नहीं देता, वह अपने आधे नियमित ग्राहक बग़ल की दुकान को दे देता है। असली दिक़्क़त उधार देने में नहीं है — वह वापस माँगने में है, और वह भी इसलिए कि ज़्यादातर दुकानों में माँगने का कोई तय तरीक़ा ही नहीं होता।

जब तरीक़ा तय नहीं होता तो वसूली मूड पर चलती है। महीनों कुछ नहीं कहा जाता, फिर किसी दिन पैसे की तंगी में सीधे तक़ाज़ा हो जाता है। ग्राहक के लिए यह अचानक आया हुआ इल्ज़ाम है, आपके लिए तीन महीने का जमा हुआ गुस्सा। दोनों सही हैं, और रिश्ता वहीं बिगड़ता है।

_[Figure: एक ही क्रम, हर ग्राहक के लिए। यही उसे आपकी नाराज़गी से अलग करता है।]_

### तीन पड़ाव, और हर पड़ाव का अलग काम

नीचे दिया क्रम कोई क़ानून नहीं है, लेकिन इसका ढाँचा मायने रखता है: हर पड़ाव पर संदेश का लहजा एक क़दम आगे बढ़ता है, और यह बढ़ना पहले से तय होता है — उस दिन आपका मन कैसा है, उस पर नहीं।

1. **दिन ७ — सिर्फ़ जानकारी** — एक छोटा संदेश जिसमें रकम और तारीख़ हो, और कोई माँग न हो। "नमस्ते, ४ अगस्त का ₹१,२०० बाक़ी है। धन्यवाद।" इतना ही। ज़्यादातर पैसा इसी पड़ाव पर आ जाता है, क्योंकि असल वजह भूल जाना होती है, न देने का इरादा नहीं।
2. **दिन १५ — तारीख़ तय कीजिए** — अब सवाल पैसे का नहीं, तारीख़ का पूछिए: "कब तक हो पाएगा?" यह ग्राहक को हाँ या ना नहीं, एक दिन बताने पर लाता है। जो तारीख़ वह ख़ुद बताए, उसे खाते में लिख लीजिए — अगली बार बात उसी तारीख़ से शुरू होगी।
3. **दिन ३० — आमने-सामने** — तीस दिन के बाद संदेश की जगह बातचीत लीजिए, और अकेले में लीजिए — दूसरे ग्राहकों के सामने कभी नहीं। यहाँ मक़सद पूरा पैसा नहीं, कोई भी हिस्सा और एक साफ़ योजना है। आधा आज और आधा अगले हफ़्ते, तय तारीख़ के साथ, कुछ न आने से बहुत बेहतर है।
4. **उसी वक़्त दर्ज कीजिए** — जो भी आए, उसी समय खाते में चढ़ाइए और ग्राहक को स्क्रीन दिखा दीजिए। जो रकम दोनों ने उसी दिन देख ली, वह बाद में बहस का मुद्दा नहीं बनती।

**पहला संदेश माँग न हो.** जो संदेश सिर्फ़ रकम और तारीख़ बताता है, उसका जवाब देना आसान है। जो संदेश "कब दे रहे हैं?" से शुरू होता है, उसे टालना आसान है। यही छोटा-सा फ़र्क़ तय करता है कि सातवें दिन पैसा आएगा या तीसवें दिन बहस।

### कुल रकम मत देखिए, उम्र देखिए

"कुल उधार ₹७२,०००" एक नंबर है और यह आपको कुछ नहीं बताता। वही रकम अगर उम्र के हिसाब से बाँट दी जाए तो यह बता देती है कि कल सुबह किसे फ़ोन करना है।

| कितना पुराना | क्या मतलब है | क्या कीजिए |
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| ० – ३० दिन | सामान्य कारोबार | कुछ ख़ास नहीं, बस दर्ज रहे |
| ३१ – ६० दिन | भूल गया है | तारीख़ तय कराइए |
| ६१ – ९० दिन | टाल रहा है | आमने-सामने, कोई हिस्सा लीजिए |
| ९० दिन से ऊपर | अपने आप नहीं आएगा | किश्त तय कीजिए, नया उधार रोकिए |

ध्यान दीजिए कि सबसे बड़ी रकम अक्सर सबसे पुरानी नहीं होती, और सबसे पुरानी रकम अक्सर सबसे बड़ी नहीं होती। दोनों को एक साथ देखना ही वह जगह है जहाँ ज़्यादातर दुकानदार ग़लत ग्राहक को फ़ोन कर बैठते हैं।

खाता ऐप में हर ग्राहक का बकाया और उसकी तारीख़ दोनों दर्ज रहते हैं, इसलिए यह बाँटना हाथ से जोड़े बिना हो जाता है। अगर आप अभी बही पर हैं, तो एक कागज़ पर यही चार ख़ाने बना लीजिए — तरीक़ा वही है, मेहनत थोड़ी ज़्यादा।

### नंबर के बिना याद दिलाना टकराव है

यह वह चीज़ है जो सबसे ज़्यादा छूटती है। अगर ग्राहक का फ़ोन नंबर आपके पास नहीं है, तो याद दिलाने का इकलौता तरीक़ा यह है कि आप उसका दुकान पर आने का इंतज़ार करें और तब कहें। यानी हर याद दिलाना किसी और के सामने, और किसी ऐसे मौक़े पर जब वह कुछ ख़रीदने आया था।

नंबर होने पर वही बात अकेले में, बिना गवाह के, और उस वक़्त होती है जब वह जेब देख सकता है। इसीलिए नंबर पूछने की सबसे अच्छी घड़ी वही है जब आप पहली बार उधार दर्ज कर रहे हों — उस समय कोई मना नहीं करता।

> नंबर उधार का हिस्सा है, ग्राहक की जानकारी का नहीं।

### जो नहीं करना चाहिए

- दूसरे ग्राहकों के सामने तक़ाज़ा। इससे पैसा आने की उम्मीद नहीं बढ़ती, ग्राहक का दुकान छोड़ना तय हो जाता है।
- बिना तारीख़ के "जल्दी दे दीजिए"। जिस बात में तारीख़ नहीं, उसे टालने में कोई क़ीमत नहीं चुकानी पड़ती।
- पुराना बकाया रहते हुए नया उधार बढ़ाते जाना। रकम जितनी बड़ी होगी, ग्राहक का सामना करना उतना ही मुश्किल होगा — उसके लिए भी।
- हर ग्राहक के साथ अलग नियम। जिस दिन ग्राहक को लगा कि उसके साथ अलग बर्ताव है, बात रकम से हटकर इज़्ज़त पर चली जाती है।

**एक सीमा तय कीजिए, और पहले से बता दीजिए.** उधार की कोई ऊपरी सीमा हर दुकान में होनी चाहिए, और वह ग्राहक को उस दिन पता चलनी चाहिए जिस दिन खाता शुरू हो — उस दिन नहीं जिस दिन आप मना कर रहे हों। पहले से बताई गई सीमा दुकान का नियम है; मौक़े पर बताई गई सीमा ग्राहक को अविश्वास लगती है।

### छोटी शुरुआत, इसी हफ़्ते

पूरा सिस्टम एक दिन में बदलने की ज़रूरत नहीं। इस हफ़्ते सिर्फ़ इतना कीजिए: अपने दस सबसे पुराने बकाया छाँटिए, हर एक को वही छोटा-सा जानकारी वाला संदेश भेजिए, और जो जवाब आए उसे तारीख़ के साथ दर्ज कीजिए।

अगले हफ़्ते आपके पास दो चीज़ें होंगी जो आज नहीं हैं — कुछ पैसा, और यह जानकारी कि कौन जवाब देता है और कौन नहीं। दूसरी चीज़ पहली से ज़्यादा काम आएगी।

## Common questions

**उधार माँगने का सही समय क्या है?**

जो भी समय हो, वह तय होना चाहिए और हर ग्राहक के लिए एक जैसा होना चाहिए। ज़्यादातर दुकानों के लिए तीन पड़ाव ठीक बैठते हैं — सौदे के सात दिन बाद एक हल्की याद, पंद्रह दिन पर भुगतान की तारीख़ तय करना, और तीस दिन पर आमने-सामने बात। तय क्रम का असली फ़ायदा यह है कि ग्राहक इसे आपकी नाराज़गी नहीं, दुकान का नियम समझता है।

**क्या बार-बार याद दिलाने से ग्राहक नाराज़ होकर चला जाता है?**

नाराज़गी याद दिलाने से नहीं, अचानक और असमान व्यवहार से आती है। जो ग्राहक तीन महीने तक कुछ न सुने और फिर सीधे तक़ाज़े का सामना करे, वह ज़रूर बुरा मानेगा। जिसे हर बार सातवें दिन वही सीधा-सा संदेश मिलता रहा हो, उसके लिए यह दुकान का सामान्य तरीक़ा है।

**पहले किससे वसूली करूँ — जिसका सबसे ज़्यादा बकाया है या जो सबसे पुराना है?**

सबसे पुराने से। बड़ी रकम अगर नई है तो आम तौर पर आ जाती है; छोटी रकम अगर छह महीने पुरानी है तो हर बीतते हफ़्ते के साथ उसके आने की उम्मीद घटती जाती है। इसीलिए कुल बकाया देखकर फ़ैसला करना ठीक नहीं — उसे उम्र के हिसाब से बाँटकर देखिए।

**अगर ग्राहक कहे कि उसने पैसे दे दिए थे तो क्या करूँ?**

यह तभी बहस बनती है जब दोनों तरफ़ अलग-अलग रिकॉर्ड हों। हर लेन-देन उसी वक़्त दर्ज कीजिए और रकम बोलकर ग्राहक को स्क्रीन दिखा दीजिए। जो हिसाब दोनों ने उसी दिन देख लिया हो, उस पर छह महीने बाद झगड़ा बहुत कम होता है।
