हर दुकान की बही में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर दुकानदार आगे बढ़ जाता है। रकम वहीं लिखी है, महीनों से वैसी ही, और दोनों पक्ष जानते हैं कि वह अपने आप नहीं आने वाली।
इन नामों के साथ दो ग़लतियाँ होती हैं। पहली, उन्हें वही याद दिलाने वाले संदेश भेजते रहना जो नए बकाया पर चलते हैं। दूसरी, उन्हें अपने हिसाब में ऐसे गिनते रहना जैसे वह पैसा आने वाला हो।
पुराना बकाया अलग चीज़ है
नया बकाया ज़्यादातर भूल जाने से बनता है, इसलिए एक सीधा संदेश उसे हल कर देता है। पुराना बकाया भूलने से नहीं बनता — वह इसलिए बनता है कि या तो पैसा नहीं है, या टालना आदत बन चुकी है।
इसीलिए वही संदेश यहाँ काम नहीं करते। जो ग्राहक आठ महीने से टाल रहा है, उसने वे संदेश पहले भी पढ़े हैं और उन्हें नज़रअंदाज़ करना सीख लिया है। यहाँ कुछ अलग चाहिए।
जो सचमुच काम करता है
- 1
सूची बनाइए, उम्र के हिसाब से
सबसे पुराना सबसे ऊपर। रकम के हिसाब से नहीं — यही वह जगह है जहाँ ज़्यादातर दुकानदार ग़लत नाम से शुरुआत कर देते हैं।
- 2
आमने-सामने बात कीजिए, अकेले में
फ़ोन नहीं, संदेश नहीं। और किसी दूसरे ग्राहक के सामने कभी नहीं। जहाँ इज़्ज़त बचती है, वहीं पैसा भी आता है।
- 3
पूरा नहीं, कुछ माँगिए
"पूरा कब देंगे" का जवाब टालना है। "इस महीने कितना हो पाएगा" का जवाब एक रकम होती है। यह छोटा सा फ़र्क़ पूरी बातचीत बदल देता है।
- 4
तारीख़ों के साथ किश्त तय कीजिए
उतनी किश्त जितनी वह सचमुच दे सके। लिख लीजिए और उसे भी बता दीजिए कि लिख लिया है।
- 5
हर किश्त उसी दिन दर्ज कीजिए
और उसे दिखा दीजिए। घटता हुआ बकाया देखना ही वह चीज़ है जो ग्राहक को अगली किश्त तक टिकाए रखती है।
नया उधार रोकना
यह सबसे मुश्किल हिस्सा है, ख़ास तौर पर तब जब वह ग्राहक रोज़ का हो और उसके साथ पुराना रिश्ता हो। पर पुराना बकाया चलते हुए नया उधार बढ़ाना दोनों के लिए बुरा है।
रकम जितनी बड़ी होगी, ग्राहक का सामना करना उतना ही मुश्किल होगा — और एक दिन वह दुकान पर आना ही बंद कर देगा। उस दिन आप दोनों चीज़ें खो देंगे: पैसा भी, और ग्राहक भी। नया उधार रोकना उस ग्राहक को बचाने का तरीक़ा है, उसे सज़ा देने का नहीं।
जो ग्राहक शर्मिंदगी की वजह से दुकान आना बंद कर दे, उससे न पैसा आता है न कारोबार।
जो नहीं आएगा
कुछ रकमें सचमुच नहीं आतीं। ग्राहक शहर छोड़ गया, कारोबार बैठ गया, या हालात ऐसे हैं कि वह चुका ही नहीं सकता। इन्हें उम्मीद में गिनते रहना दो नुक़सान करता है।
- आपका कुल बकाया उससे ज़्यादा दिखता है जो सचमुच आने वाला है, और उसी नंबर पर आप ख़रीद या ख़र्च का फ़ैसला ले लेते हैं।
- और हर महीने वही नाम देखकर वही खीज होती है, जिससे बाक़ी वसूली पर ध्यान कम हो जाता है।
इन्हें अपने हिसाब में अलग कर दीजिए — मिटाइए नहीं, अलग कीजिए। रिकॉर्ड में रहने दीजिए ताकि कल कोई वापस आए तो हिसाब मौजूद हो, पर अपनी योजनाओं में उन्हें मत गिनिए।
और आगे के लिए
पुराने बकाया का सबसे बड़ा सबक़ यह है कि वह सब कभी नया बकाया था। जिस दिन उस पर कोई तय क्रम नहीं चला — सात दिन पर याद, पंद्रह पर तारीख़, तीस पर आमने-सामने — उसी दिन से वह पुराना होना शुरू हुआ।
इसलिए पुरानी सूची निपटाने के साथ-साथ यह भी तय कीजिए कि आज से जो उधार बन रहा है, वह इस सूची में कभी न पहुँचे।