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स्टाफ

स्टाफ़ के साथ काम कैसे बाँटें — जो काम किसी के नाम नहीं, वह किसी का नहीं

दुकान में सबसे ज़्यादा वही काम छूटते हैं जो सबके होते हैं। हल नया आदमी रखना नहीं है — हल यह है कि हर काम का एक नाम हो।

6 मिनट का पाठ

कौन सा काम किसकादिन के चार काम, और हर काम के सामने उसका नाम जिसे वह करना है।जो काम किसी के नाम नहीं, वह किसी का नहींसुबह का स्टॉक देखनाराजूबिल बनानाराजूउधार की याद दिलानासीमादिन का मिलानमालिक

संक्षेप में

  • हर रोज़ के काम का एक नाम होना चाहिए — कौन करेगा, और कब तक।
  • जो काम "सबका" है वह किसी का नहीं होता। सबसे ज़्यादा यही छूटते हैं।
  • काम बाँटने का मतलब आदमी बढ़ाना नहीं है। ज़्यादातर दुकानों में लोग काफ़ी हैं, बँटवारा नहीं है।
  • बँटवारा लिखा हुआ हो और दिखने वाली जगह पर हो। ज़बानी बँटवारा एक हफ़्ते में मिट जाता है।

दुकान पर काम की कमी शायद ही कभी होती है। जो कमी होती है वह इस बात की होती है कि कौन सा काम किसका है। और यह कमी उन कामों में सबसे ज़्यादा दिखती है जो रोज़ के हैं पर तुरंत ज़रूरी नहीं लगते।

ग्राहक सामने खड़ा हो तो बिल कोई न कोई बना ही देगा। पर उधार की याद दिलाना, सुबह स्टॉक देखना, दिन के आख़िर में गल्ला मिलाना — ये वे काम हैं जिनके लिए कोई सामने खड़ा नहीं होता, इसलिए ये उसी दिन होते हैं जिस दिन किसी को याद आ जाए।

काम के सामने नाम। यही पूरा तरीक़ा है।दिन के चार काम एक तरफ़ लिखे हैं और हर काम के सामने उस आदमी का नाम है जिसे वह करना है।जो काम किसी के नाम नहीं, वह किसी का नहींसुबह का स्टॉक देखनाराजूबिल बनानाराजूउधार की याद दिलानासीमादिन का मिलानमालिक
काम के सामने नाम। यही पूरा तरीक़ा है।

पहले काम गिनिए, फिर बाँटिए

बँटवारे से पहले यह लिखना पड़ता है कि दिन में करने लायक़ काम हैं क्या। ज़्यादातर दुकानों में यह सूची कभी नहीं बनी होती, और बनते ही आधी बात साफ़ हो जाती है।

कबकामकितना समय
सुबह खुलते हीकल का बचा हिसाब और आज का स्टॉक देखना१० मिनट
दिन भरबिल बनाना, ग्राहक जोड़नालगातार
दोपहरउधार की याद दिलाना१५ मिनट
शामजो माल कम है उसका ऑर्डर१० मिनट
बंद करते वक़्तनक़द मिलान१० मिनट

इस सूची में सबसे ज़रूरी बात यह है कि पहले, तीसरे, चौथे और पाँचवें काम में कुल पैंतालीस मिनट लगते हैं। यानी दिक़्क़त समय की नहीं है — दिक़्क़त यह है कि इन चारों का कोई मालिक नहीं है।

बाँटने के तीन नियम

  1. 1

    हर काम का एक ही नाम हो

    दो लोगों को एक ही काम देना उसे बिना मालिक के छोड़ देने जैसा है। दोनों मान लेते हैं कि दूसरा कर लेगा।

  2. 2

    काम के साथ समय भी तय हो

    "उधार की याद दिलाना" काम नहीं है। "रोज़ दोपहर तीन बजे, पंद्रह मिनट" काम है। बिना समय के काम हमेशा कल पर जाता है।

  3. 3

    काम के साथ ज़रूरी पहुँच भी दीजिए

    जिसे उधार की याद दिलानी है उसे ग्राहकों का बकाया दिखना चाहिए। जिसे ऑर्डर करना है उसे स्टॉक दिखना चाहिए। काम देकर पहुँच न देना उसे न देने के बराबर है।

  4. 4

    नतीजा कहीं दर्ज हो

    मिलान का नंबर, भेजे गए संदेश, दिया गया ऑर्डर — जो काम अपना कोई निशान छोड़ता है, वही टिकता है।

लिखा हुआ बँटवारा

ज़बानी बँटवारा तीन दिन चलता है। चौथे दिन कोई छुट्टी पर होता है, पाँचवें दिन भीड़ ज़्यादा होती है, और छठे दिन सब कुछ वापस वहीं आ जाता है जहाँ से शुरू हुआ था।

बँटवारा एक काग़ज़ पर लिखकर दुकान में ऐसी जगह लगाइए जहाँ रोज़ नज़र पड़े। इसमें कर्मचारी का अपमान नहीं है — इसमें यह साफ़ हो जाता है कि किससे क्या उम्मीद है, और यह कर्मचारी के हक़ में भी है।

जिस काम का कोई नाम नहीं, वह उसी दिन होता है जिस दिन किसी को याद आ जाए।

जब कोई न आए

बँटवारे की असली परीक्षा उस दिन होती है जब कोई छुट्टी पर हो। इसलिए हर काम के लिए एक दूसरा नाम भी होना चाहिए — वह जो उस दिन करेगा जब पहला मौजूद न हो।

यह छोटी सी बात दुकान को उन दिनों में चलाए रखती है जब आधा स्टाफ़ नहीं होता — और ऐसे दिन हर महीने आते हैं, त्योहारों में तो और भी ज़्यादा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छोटी दुकान में दो ही लोग हैं, फिर भी काम बाँटना ज़रूरी है?

दो लोगों में बँटवारा और भी ज़रूरी है, क्योंकि वहाँ यह मान लिया जाता है कि "जो ख़ाली होगा वह कर लेगा"। नतीजा यह होता है कि दोनों व्यस्त होने पर वह काम कोई नहीं करता — और यही वे काम होते हैं जो रोज़ नहीं दिखते पर महीने बाद भारी पड़ते हैं, जैसे उधार की याद दिलाना या स्टॉक देखना।

कौन सा काम किसे देना चाहिए?

जो काम पैसे को छूता है, वह और जो काम उसी पैसे की जाँच करता है — ये दोनों एक ही आदमी के पास नहीं होने चाहिए। बाक़ी बँटवारा इस आधार पर कीजिए कि कौन कब मौजूद रहता है और किसे किस काम में सहूलियत है। सुबह आने वाले को सुबह का काम दीजिए, न कि उसे जो दोपहर में आता है।

काम बाँटने के बाद भी नहीं होता तो?

तीन में से कोई एक वजह होती है: काम बताया गया था पर लिखा नहीं गया, समय तय नहीं था, या करने वाले के पास उसके लिए ज़रूरी पहुँच नहीं थी। तीनों में से आख़िरी सबसे ज़्यादा होती है और सबसे कम दिखती है — किसी को उधार की याद दिलाने का काम देना और ग्राहकों की सूची न दिखाना, दोनों साथ नहीं चलते।

क्या हर काम की जाँच भी करनी पड़ेगी?

हर काम की नहीं, पर उन कामों की ज़रूर जिनका नतीजा किसी नंबर में दिखता है — जैसे दिन का मिलान या स्टॉक की गिनती। जाँच का मतलब निगरानी नहीं है; मतलब यह है कि नतीजा कहीं दर्ज हो और आप उसे देख सकें। जो काम बिना किसी निशान के होता है, उसके बारे में यह कभी नहीं पता चलता कि वह हुआ भी या नहीं।

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