"दस प्रतिशत छूट दे दी" — यह वाक्य दुकान पर दिन में कई बार बोला जाता है, और लगभग हमेशा यह मानकर कि दस प्रतिशत एक छोटा हिस्सा है। यह छोटा हिस्सा है, पर किसका, यही असली सवाल है।
छूट दाम से नहीं कटती। लागत वहीं की वहीं रहती है — सप्लायर आपसे कम नहीं लेगा क्योंकि आपने ग्राहक को कम पर दिया। इसलिए छूट पूरी की पूरी उसी हिस्से से जाती है जो आपका था।
एक सीधा हिसाब
मान लीजिए एक सामान ₹८० में आता है और ₹१०० में बिकता है। आपका मुनाफ़ा ₹२० है। अब ₹१० की छूट दीजिए — ग्राहक के लिए यह दस प्रतिशत है, आपके लिए पचास।
| छूट | ग्राहक को दिखता है | आपका मुनाफ़ा | मुनाफ़े का कितना गया |
|---|---|---|---|
| ₹० | ₹१०० | ₹२० | — |
| ₹५ | ५% छूट | ₹१५ | एक चौथाई |
| ₹१० | १०% छूट | ₹१० | आधा |
| ₹१५ | १५% छूट | ₹५ | तीन चौथाई |
| ₹२० | २०% छूट | ₹० | पूरा |
आख़िरी लाइन ध्यान से देखिए। बीस प्रतिशत की छूट, जो सुनने में बड़ी ज़रूर लगती है पर असंभव नहीं लगती, इस सामान पर पूरा मुनाफ़ा ख़त्म कर देती है। उस बिक्री से दुकान को कुछ नहीं मिला — सिर्फ़ माल गया और पैसा वापस आया।
"ज़्यादा बेचकर भरपाई" वाली बात
सबसे आम दलील यह है कि छूट से बिक्री बढ़ेगी और नुक़सान भर जाएगा। यह सही हो सकता है, पर हिसाब लगाने लायक़ है।
अगर छूट ने आपका आधा मुनाफ़ा ले लिया, तो पहले जितनी ही कमाई के लिए दोगुनी बिक्री चाहिए। यानी जो चीज़ रोज़ बीस बिकती थी, उसे चालीस बिकना होगा — सिर्फ़ बराबर पर आने के लिए। रोज़ की ज़रूरत के सामान में ऐसा शायद ही होता है, क्योंकि लोग सस्ता होने पर दोगुना तेल नहीं खाते।
जहाँ यह काम करता है, वहाँ भी अक्सर वजह अलग होती है — नया ग्राहक आया, या ग्राहक ने साथ में कुछ और ख़रीद लिया। छूट का फ़ैसला इसी दूसरी बात को ध्यान में रखकर होना चाहिए, न कि इस उम्मीद पर कि वही चीज़ दोगुनी बिकेगी।
छूट देने का बेहतर तरीक़ा
- छूट पूरी दुकान पर नहीं, चुनिंदा सामान पर दीजिए — ख़ास तौर पर उन पर जिनका मुनाफ़ा मोटा है या जो पड़े-पड़े ख़राब हो रहे हैं।
- छूट के बदले कुछ माँगिए — ज़्यादा मात्रा, नक़द भुगतान, या पुराना बकाया चुकता। बिना बदले की छूट सिर्फ़ आदत बनाती है।
- एक सीमा तय कीजिए और उस पर टिकिए। जो ग्राहक जानता है कि यहाँ पाँच प्रतिशत से ऊपर नहीं मिलता, वह मोल-भाव में समय नहीं लगाता।
- हर छूट बिल में लिखिए। बिना लिखी छूट किसी रिपोर्ट में नहीं आती — महीने के आख़िर में सिर्फ़ यह दिखता है कि मुनाफ़ा कम है, और वजह नहीं दिखती।
जो छूट बिल पर नहीं लिखी, वह मुनाफ़े में से गई ज़रूर है — पर किसी हिसाब में नहीं दिखेगी।
महीने में एक बार
महीने के आख़िर में एक बार देख लीजिए कि कुल कितनी छूट गई। ज़्यादातर दुकानदार यह नंबर पहली बार देखकर चौंकते हैं, क्योंकि दिन में दस-दस रुपये की छूट कभी बड़ी नहीं लगती और महीने में जुड़कर बड़ी हो जाती है।
यह नंबर देखने का मक़सद छूट बंद करना नहीं है। मक़सद यह जानना है कि आपकी दुकान असल में किस दाम पर बेच रही है — क्योंकि जो दाम लिखा है वह अक्सर वह दाम नहीं होता जो सचमुच लिया जाता है।