ख़रीद का हिसाब ज़्यादातर दुकानों में एक ही लाइन का होता है — "आज फ़लाँ से इतने का माल आया"। यह लाइन सही है, पर अधूरी है, और उसकी क़ीमत उस दिन चुकानी पड़ती है जिस दिन कुछ कम निकले या कोई पुरानी रकम याद न आए।
एक ख़रीद असल में तीन अलग बातें हैं: क्या माँगा गया, क्या पहुँचा, और कितना पैसा देना बाक़ी है। ये तीनों एक-दूसरे से नहीं निकाली जा सकतीं, इसलिए तीनों अलग-अलग दर्ज होनी चाहिए।
पहला हिस्सा — क्या माँगा गया
यह वही हिस्सा है जो सबसे ज़्यादा छूटता है, क्योंकि यह सबसे कम ज़रूरी लगता है। ऑर्डर फ़ोन पर दिया जाता है, याद रखा जाता है, और माल आने पर उसकी ज़रूरत ख़त्म मान ली जाती है।
पर जिस दिन पचास में से छियालीस बोरी आएँगी, आपको वह चार बोरी सिर्फ़ तभी दिखेंगी जब पचास कहीं लिखा हो। नहीं लिखा हो तो छियालीस ही पूरा ऑर्डर लगेगा, और अगले महीने का हिसाब उसी छियालीस पर बनेगा।
दूसरा हिस्सा — कितना आया
गिनती माल उतरते वक़्त ही होनी चाहिए, गाड़ी के सामने। यह असुविधाजनक है, इसमें दस मिनट लगते हैं, और सप्लायर का आदमी जल्दी में होता है। फिर भी यही इकलौता वक़्त है जब कमी सुधर सकती है।
- बोरी या पेटी गिनिए, वज़न बाद में देखिए। संख्या पर बहस कम होती है।
- टूटा या ख़राब माल उसी वक़्त अलग रखिए और उसे भी दर्ज कीजिए।
- जो कम है उसे सप्लायर के आदमी को दिखाकर बताइए, गाड़ी जाने से पहले।
- अपनी गिनती लिखिए — उसकी पर्ची से नक़ल मत कीजिए। दोनों अलग चीज़ें हैं।
तीसरा हिस्सा — कितना देना बाक़ी है
यह हिस्सा उधार वसूली का उलटा है, और अजीब बात यह है कि जो दुकानदार अपने ग्राहकों का बकाया रोज़ देखता है, वह अक्सर अपने सप्लायर का बकाया याद पर छोड़ देता है।
| क्या देखना है | क्यों | कितनी बार |
|---|---|---|
| हर सप्लायर का अलग बकाया | कुल रकम किसी काम की नहीं होती | हर हफ़्ते |
| कौन सी रकम सबसे पुरानी है | पुराना बकाया रिश्ते पर असर डालता है | हर हफ़्ते |
| इस महीने कितना देना है | पैसे का इंतज़ाम पहले से हो | महीने की शुरुआत में |
| कहीं दो बार तो नहीं दिया | जल्दी में यह होता है | महीने के आख़िर में |
आख़िरी लाइन को हल्के में मत लीजिए। जिन दुकानों में भुगतान कभी नक़द, कभी फ़ोन से और कभी किसी और के हाथ जाता है, वहाँ एक ही रकम दो बार जाना असामान्य नहीं है — और सप्लायर हमेशा बताता भी नहीं।
जब हिसाब मिलता न हो
सप्लायर के साथ हिसाब का झगड़ा लगभग हमेशा एक ही वजह से होता है: दोनों तरफ़ अलग-अलग रिकॉर्ड हैं और दोनों अपने-अपने रिकॉर्ड से सही हैं। इसका हल बहस नहीं, तारीख़वार मिलान है।
एक काग़ज़ पर अपनी तरफ़ की सारी ख़रीद और सारा भुगतान तारीख़ के हिसाब से लिखिए, और उससे उनका हिसाब मिलाइए। नौ में से आठ बार फ़र्क़ किसी एक एंट्री का निकलता है — एक भुगतान जो उनके यहाँ नहीं चढ़ा, या एक माल जो आपके यहाँ नहीं चढ़ा।
सप्लायर से हिसाब तारीख़ पर मिलता है, याद पर नहीं।
एक छोटी शुरुआत
अगले माल की गाड़ी आने पर सिर्फ़ इतना कीजिए: ऑर्डर देते वक़्त वह लिख लीजिए, माल उतरते वक़्त गिनकर लिखिए, और भुगतान करते वक़्त उसे दर्ज कीजिए। तीन जगह, तीन लाइनें।
तीन महीने बाद आपके पास हर सप्लायर का एक साफ़ रिकॉर्ड होगा — कौन पूरा माल भेजता है, कौन हमेशा कम भेजता है, और किससे हिसाब में सबसे ज़्यादा वक़्त लगता है। यह जानकारी दाम से कम क़ीमती नहीं है।