दुकान में सामान ख़त्म होने का पता आम तौर पर तीन में से किसी एक तरीक़े से चलता है: ग्राहक माँगे और न मिले, कोई डिब्बा उठाते वक़्त हल्का लगे, या महीने की गिनती में सामने आए। तीनों का एक ही मतलब है — पता तब चला जब बिक्री जा चुकी थी।
इसका हल पूरा स्टॉक रोज़ गिनना नहीं है। हल यह है कि कुछ चुनी हुई चीज़ों के लिए पहले से एक मात्रा तय कर दी जाए, जिस पर पहुँचते ही ऑर्डर जाएगा। शून्य पर नहीं — उससे बहुत पहले।
बिंदु कैसे तय होता है
इसमें सिर्फ़ दो चीज़ें लगती हैं, और दोनों आपको पहले से पता हैं — भले लिखी न हों।
- 1
रोज़ की औसत बिक्री निकालिए
पिछले तीस दिन में जितना बिका, उसे तीस से भाग दीजिए। बहुत सटीक होने की ज़रूरत नहीं; "रोज़ लगभग चार" काफ़ी है।
- 2
सप्लायर के असली दिन गिनिए
वह नहीं जो वह कहता है — वह जो पिछली तीन बार सचमुच लगा। यही वह जगह है जहाँ ज़्यादातर हिसाब ग़लत बैठता है।
- 3
दोनों को गुणा कीजिए
रोज़ चार और छह दिन का मतलब चौबीस। यानी जब चौबीस बचे हों, तब तक ऑर्डर जा चुका होना चाहिए।
- 4
दो-तीन दिन का बचाव जोड़िए
गाड़ी लेट होती है, माल कम आता है, त्योहार पड़ जाता है। यह जोड़ा हुआ हिस्सा उन दिनों के लिए है — इसे बहुत बड़ा भी मत रखिए, वरना पैसा माल में फँसा रहेगा।
- 5
बिंदु लिख लीजिए और उसे मानिए
बिंदु पर पहुँचने का मतलब है ऑर्डर, चाहे उस दिन गोदाम भरा लगे। जिस दिन आपने "अभी तो है" कहकर टाला, उसी दिन से यह तरीक़ा काम करना बंद कर देता है।
| रोज़ बिकता है | सप्लायर के दिन | बचाव | बिंदु |
|---|---|---|---|
| २ | ४ दिन | २ दिन | १२ |
| ४ | ६ दिन | २ दिन | ३२ |
| १० | ३ दिन | २ दिन | ५० |
| १ | १० दिन | ३ दिन | १३ |
इस तालिका में ध्यान देने लायक़ बात यह है कि सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ का बिंदु सबसे ऊँचा है, पर सबसे दूर के सप्लायर वाली चीज़ का बिंदु भी उसकी बिक्री के मुक़ाबले ऊँचा है। दोनों वजहें अलग हैं और दोनों असली हैं।
किन चीज़ों पर लगाना है
यह तरीक़ा पूरे स्टॉक पर लगाने की चीज़ नहीं है। पाँच सौ चीज़ों के लिए बिंदु तय करना दो दिन का काम है और तीसरे दिन छोड़ दिया जाता है।
- जो रोज़ बिकती है और ख़त्म होने पर ग्राहक लौट जाता है — यही सबसे ऊपर।
- जो सप्लायर बहुत दूर का है या महीने में एक बार ही आता है।
- जो त्योहार या मौसम में अचानक तेज़ चलती है।
- जिसका दाम ज़्यादा है और जिसे "फिर मँगा लेंगे" कहकर टालना महँगा पड़ता है।
इनके अलावा बाक़ी सारा सामान महीने में एक बार की नज़र से चल जाता है। बीस चीज़ों का बिंदु सचमुच काम करता है; पाँच सौ चीज़ों का बिंदु सिर्फ़ काग़ज़ पर रहता है।
जो सामान बहुत ज़्यादा पड़ा है
यही तरीक़ा उलटी तरफ़ से भी काम आता है। अगर किसी चीज़ का स्टॉक बिंदु से कई गुना ऊपर पड़ा है और वह हिल नहीं रही, तो वहाँ आपका पैसा फँसा हुआ है — और वही पैसा उस सामान में लग सकता था जो रोज़ बिकता है।
ख़ाली शेल्फ़ बिक्री ले जाती है। भरी हुई शेल्फ़ पैसा रोक लेती है। बिंदु दोनों के बीच की लकीर है।
इस हफ़्ते क्या कीजिए
अपनी दस सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ें लीजिए। हर एक के लिए रोज़ की बिक्री और सप्लायर के असली दिन लिखिए, और बिंदु निकाल लीजिए। यह आधे घंटे का काम है।
अगले महीने आप देखेंगे कि इन दस में से कोई भी ख़त्म नहीं हुई। बाक़ी सामान पर यही तरीक़ा तब बढ़ाइए जब यह दस पर टिक चुका हो।