Skip to content
Khataby Lacspace
दुकान चलाना

दुकान का पैसा और घर का ख़र्च अलग कैसे रखें

गल्ले से घर का ख़र्च निकालना ग़लत नहीं है। उसे लिखे बिना निकालना ग़लत है — क्योंकि उसके बाद दुकान के सारे नंबर झूठ बोलने लगते हैं।

6 मिनट का पाठ

दुकान का पैसा और घर का ख़र्चएक ही गल्ले से दो रास्ते निकलते हैं — दुकान का ख़र्च और घर का ख़र्च — और दोनों अलग-अलग लिखे जाते हैं।एक ही गल्ला, दो अलग हिसाबदिन की बिक्रीदुकान का ख़र्चमाल, भाड़ा, बिजलीघर का ख़र्चफ़ीस, राशन, दवा

संक्षेप में

  • गल्ले से घर का पैसा निकालना बंद करने की ज़रूरत नहीं। उसे दर्ज करना शुरू करने की ज़रूरत है।
  • अपने लिए एक तय रकम निकालिए — महीने में एक बार, तय तारीख़ पर। जब मन हो तब निकालना ही असली दिक़्क़त है।
  • बिना दर्ज निकाला हुआ पैसा दो झूठ बनाता है: दुकान का मुनाफ़ा कम दिखता है और गल्ले का मिलान रोज़ बिगड़ता है।
  • दुकान का ख़र्च और घर का ख़र्च — दोनों लिखिए, पर अलग-अलग। मिलाकर लिखना न लिखने से थोड़ा ही बेहतर है।

छोटी दुकानों में यह लगभग हर जगह होता है: बच्चे की फ़ीस गल्ले से चली जाती है, शाम को सब्ज़ी उसी पैसे से आती है, और महीने की दवा भी वहीं से। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है — दुकान इसीलिए है।

ग़लत सिर्फ़ यह है कि यह पैसा कहीं लिखा नहीं जाता। और उसका नतीजा यह होता है कि दुकान के सारे नंबर धीरे-धीरे झूठ बोलने लगते हैं — मुनाफ़ा कम दिखता है, गल्ला रोज़ कम बैठता है, और साल के आख़िर में यह समझ नहीं आता कि कमाई गई कहाँ।

दोनों रास्ते असली हैं। दोनों लिखे जाने चाहिए, पर अलग-अलग।एक ही गल्ले से दो रास्ते निकलते हैं — दुकान का ख़र्च और घर का ख़र्च — और दोनों अलग-अलग दर्ज होते हैं।एक ही गल्ला, दो अलग हिसाबदिन की बिक्रीदुकान का ख़र्चमाल, भाड़ा, बिजलीघर का ख़र्चफ़ीस, राशन, दवा
दोनों रास्ते असली हैं। दोनों लिखे जाने चाहिए, पर अलग-अलग।

बिना लिखे निकालने का असर

एक मिसाल से यह साफ़ हो जाता है। मान लीजिए महीने में दुकान से ₹१८,००० घर पर गए, थोड़े-थोड़े करके, और कुछ भी दर्ज नहीं हुआ।

  • गल्ले का मिलान रोज़ थोड़ा कम बैठेगा, और वजह कभी नहीं मिलेगी।
  • महीने का मुनाफ़ा ₹१८,००० कम दिखेगा, जबकि दुकान ने वह कमाया था।
  • यह कभी पता नहीं चलेगा कि घर पर कितना गया — क्योंकि वह रकम कहीं जुड़ी ही नहीं।
  • और अगर किसी दिन सचमुच कोई गड़बड़ हो जाए, तो वह इसी अंतर में छिपी रहेगी।

आख़िरी बात सबसे भारी है। जिस दुकान में रोज़ बिना वजह का फ़र्क़ रहता है, वहाँ असली गड़बड़ी को पहचानने का कोई तरीक़ा नहीं बचता।

अपने लिए तनख़्वाह तय कीजिए

सबसे आसान और सबसे टिकाऊ तरीक़ा यही है। महीने की एक तारीख़ तय कीजिए और उस दिन अपने लिए एक तय रकम निकालिए — ठीक वैसे ही जैसे किसी कर्मचारी की तनख़्वाह निकलती है।

  1. 1

    पिछले तीन महीने का अंदाज़ा लगाइए

    घर पर लगभग कितना जाता है — किराया, राशन, फ़ीस, दवा, आना-जाना। ठीक-ठीक नहीं, मोटा-मोटा।

  2. 2

    एक रकम तय कीजिए और तारीख़ तय कीजिए

    मान लीजिए हर महीने की पहली तारीख़। रकम ऐसी हो जो दुकान सचमुच दे सके, अंदाज़े से ज़्यादा नहीं।

  3. 3

    उसे एक ही बार, एक ही एंट्री में दर्ज कीजिए

    यह दुकान का ख़र्च नहीं है — यह मालिक का निकाला हुआ पैसा है, और उसे उसी नाम से दर्ज होना चाहिए।

  4. 4

    बीच में कुछ निकले तो वह भी लिखिए

    अचानक ज़रूरत पड़ेगी ही। उसे भी उसी खाते में जोड़िए। मक़सद रोकना नहीं, गिनना है।

दुकान का ख़र्च कौन सा है

सीमा हमेशा साफ़ नहीं होती, इसलिए एक सीधा सवाल काम आता है: अगर दुकान कल बंद हो जाए, तो क्या यह ख़र्च फिर भी होगा? अगर हाँ, तो वह घर का है।

ख़र्चकिसकाक्यों
दुकान का भाड़ा और बिजलीदुकानदुकान बंद हो तो ख़त्म
कर्मचारी की तनख़्वाहदुकानदुकान का काम है
घर की बिजली और राशनघरदुकान से कोई रिश्ता नहीं
गाड़ी का पेट्रोलदोनोंबाँटकर लिखिए, अंदाज़े से ही सही
बच्चे की फ़ीसघरमालिक का निकाला हुआ पैसा

जो ख़र्च दोनों तरफ़ का है, उसे मोटे अंदाज़े से बाँट दीजिए — आधा-आधा भी चलेगा। सटीक होने से ज़्यादा ज़रूरी है कि वह दोनों जगह लिखा जाए।

अगर दुकान कल बंद हो जाए और ख़र्च फिर भी होता रहे, तो वह ख़र्च दुकान का नहीं है।

अलग खाता, जितनी जल्दी हो सके

जब तक सारा कारोबार नक़द था, यह इतना ज़रूरी नहीं था। अब जब आधी बिक्री यूपीआई से आती है, यह ज़रूरी हो गया है — क्योंकि दुकान का पैसा उसी खाते में आ रहा है जिससे घर के बिल भी जाते हैं।

दुकान के लिए अलग खाता होने पर यह बँटवारा अपने आप हो जाता है। महीने में एक बार उसमें से अपनी तय रकम अपने निजी खाते में भेजिए — और आपका पूरा हिसाब उसी एक एंट्री में साफ़ हो जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या दुकान के पैसे से घर का ख़र्च नहीं करना चाहिए?

करना चाहिए — दुकान चलती ही इसलिए है। सवाल यह नहीं कि पैसा निकाला जाए या नहीं, सवाल यह है कि वह दर्ज हो या नहीं। बिना दर्ज निकाला हुआ पैसा दुकान के हर नंबर को ग़लत कर देता है: मुनाफ़ा कम दिखता है, गल्ला रोज़ कम बैठता है, और यह भी पता नहीं चलता कि साल भर में घर पर कितना गया।

हर छोटी रकम लिखना मुश्किल नहीं है?

इसीलिए ज़्यादातर दुकानदार महीने में एक तय रकम निकालने का तरीक़ा अपनाते हैं — जैसे तनख़्वाह। रोज़ पचास-सौ निकालने के बजाय महीने की एक तारीख़ पर एक रकम निकालिए और उसे एक बार दर्ज कीजिए। इससे लिखने का काम भी कम होता है और यह भी दिखता है कि दुकान सचमुच कितना दे पा रही है।

दुकान और घर के लिए अलग बैंक खाता ज़रूरी है?

ज़रूरी नहीं है, पर जितनी जल्दी हो सके फ़ायदेमंद है — ख़ास तौर पर अब जब आधा पैसा यूपीआई से आता है। एक ही खाते में दोनों तरह का लेन-देन होने पर यह अलग करना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पैसा दुकान का था। अलग खाता यह काम अपने आप कर देता है, बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के।

इससे मेरी दुकान को असल में क्या फ़ायदा होगा?

दो बातें साफ़ हो जाएँगी जो आज नहीं हैं। पहली, दुकान सचमुच कितना कमा रही है — क्योंकि घर का ख़र्च दुकान का ख़र्च नहीं है और उसे मुनाफ़े में से घटाया नहीं जाना चाहिए। दूसरी, आप घर पर कितना ख़र्च कर रहे हैं — जो अक्सर अंदाज़े से कहीं ज़्यादा निकलता है।

खाता ऐप मुफ़्त है

बिलिंग, उधार खाता, स्टॉक और रिपोर्ट — सब आपके फ़ोन पर। कोई कार्ड नहीं, कुछ रद्द करने की ज़रूरत नहीं।

देखें आपको क्या मिलता है

ख़र्चदुकान का हिसाबघर का ख़र्चगल्लामुनाफ़ा

आगे पढ़ें

पुराना बकाया और वसूली की उम्मीदचार खाने — शून्य से तीस दिन, इकत्तीस से साठ, इकसठ से नब्बे, और नब्बे से ऊपर। बकाया जितना पुराना होता है, वापस आने की उम्मीद उतनी घटती जाती है।रकम नहीं घटती, वापस आने की उम्मीद घटती है० – ३०दिन३१ – ६०दिन६१ – ९०दिन९० +दिनअपने आपनहीं आएगा

पुराना बकाया जो नहीं आ रहा — उसका क्या करें

छह महीने पुराना बकाया अपने आप नहीं आएगा। उसके लिए वही तरीक़ा नहीं चलेगा जो नए बकाया पर चलता है।

पढ़ें
उधार की सीमाएक पट्टी जिस पर पहले से तय सीमा की लकीर खिंची है, और बकाया उसी लकीर तक बढ़ता है।सीमा पहले तय होती है, ज़रूरत पड़ने पर नहींतय सीमा ₹५,०००अभी बकाया ₹३,६००सीमा खाता खुलते ही बताई जाए तो वह दुकान का नियम हैमना करते वक़्त बताई जाए तो वह ग्राहक को अविश्वास लगती है

उधार की सीमा कैसे तय करें — मना करने से पहले बता दीजिए

हर दुकान में उधार की एक सीमा होती है, पर वह ज़्यादातर सिर्फ़ मालिक के मन में होती है। जो सीमा पहले बता दी जाए वह नियम है; जो मना करते वक़्त बताई जाए वह अपमान लगती है।

पढ़ें
त्योहार सीज़न के तीन हिस्सेमाँग का वक्र चढ़ता और उतरता है। पहले स्टॉक और पैसा, त्योहार के दौरान उधार की सीमा, और उसके बाद वसूली।पहलेस्टॉक और पैसादौरानउधार की सीमाबाद मेंवसूलीतीनों अलग काम हैं — एक ही तैयारी नहीं

त्योहार सीज़न की तैयारी: स्टॉक, उधार और उसके बाद की वसूली

सीज़न एक नहीं, तीन अलग काम हैं — पहले ख़रीद, बीच में उधार की सीमा, और बाद में वसूली। तीसरा ही सबसे ज़्यादा भूला जाता है।

पढ़ें
सभी लेख